घर घर दीप जले - चहुँ और खुशी फैले
सभी को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें !!
Friday, November 5, 2010
Friday, October 29, 2010
जीवन
ये जीवन भी धूप छाँव का रेला रे
कभी कठिन तो कभी सरल सा लागे ये
अग्नि क्रोध की कभी उठे
तो कभी समुन्दर उत्सव के
कभी मोह की पाँश का झंझट
कभी अर्थ संचय का चिंतन
कभी बिछडने का गम घेरे
कभी मिलन की आश सँवारे
दम्भ घोर अन्धकार घुमाये
गर्व अनुभूति आनन्दोत्सव ले आये
कभी अतृप्ति अकेलेपन की
कभी विक्षोह परम मित्रों का
इन्द्रधनुष तो बस सतरंगी
जीवन के मेले बहुरंगी
Monday, October 18, 2010
अकेला हूँ तो क्या हुआ
Saturday, August 7, 2010
इन्द्रधनुष
कल वाल स्ट्रीट पर इन्द्रधनुष देखा
अमीरों को तरह तरह के स्वांग करते देखा
किसी को अपने लाडले कुत्ते को घुमाते देखा
तो किसी को पास के जिम में वर्जिश करते देखा
इन सबसे दूर
रात के अँधेरे में,
एक गरीब वृद्ध को अपने लाडले के जीवन के लिए
खाली पड़ी हुई,
बिखरी हुई बोतलें बीनते भी देखा !!
Friday, August 6, 2010
विषमता
Thursday, July 22, 2010
बढता ही जाऊँगा
मैं ना रुकूँगा
ना ही हारूँगा
बस प्रयास के रास्ते
बढता ही जाऊँगा !!
सपने संजोकर
कर्मठ की कसौटी पर
आशा के दीप जला
बढता ही जाऊँगा !!
नदिया का बहना
सूरज का उगना
सीख लेकर प्रकृति से
बढता ही जाऊँगा !!
Monday, July 19, 2010
यादें
कुछ यादें ऐसी होती हैं
जो भूले ना जाती हैं
इनका स्मरण
खुसी के आँसुओं
से मुझे
ओस की बूंदों की भांति
प्रुफुल्लित कर देता है
मानस पर अंकित ये यादें
मंद मंद बयार की भाँती
मुझे सपनों में ले जाती हैं
अपनी गोद में लिटा कर
माँ के आँचल सा
आभास दे जाती हैं
मैं सोचता सा रहता हूँ
विवश करता हूँ
खुद को
उन यादों में फिर से जाने को
उन्मुक्त है मन
फिर से
वही राग गाने को
जो अब बसता है
सिर्फ यादों के आसमाँ में
मैं मस्त मौला
फिक्र से दूर
अरमानो के समुन्दर में
डुबकी लगा लगा कर
विचारों की उद्वेलना से दूर
तटों की खोज से बेपरख
अपनों के वटवृक्ष जैसी छाया तले
दो वक्त की रोटी
सुकून से खा रहा था
महत्वाकांक्षा की आंधी ने
विचारों को ऐसा उद्वेलित किया
मन ही मन सपनों के जाल बुन
पता नहीं कैसी उधड़बुन
के चक्रवातों में फँसा
झूठे दिलासे देता रहा
मन को बहलाने के तरीके ढूंढता फिरता
ऐसे चक्रव्यूह में जा घुसा
जहाँ सिर्फ यादें ही मनोहारी हैं ….
तर्कों के तीर
आवेशों के वेग
वर्तमान को जीने की देते हैं सीख
यादों का इन्द्रधनुषी रूप
शीतल करता
फिर से वहीं बुलाता
जहाँ से शुरू हुई थी ये दौड
Friday, July 16, 2010
परिवर्तन
परिवर्तन ही तो मुझको
चलायमान कर जाता
वरना मेरे भावों को
कौन प्रखर कर पाता
बीते पल सुमधुर यादों के
शायद विस्मृत हो जाते
परिवर्तन नकार के पन्ने
इतिहास न बनने पाते

