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Monday, June 7, 2010

एक कविता मूला की खुसी और AC पर ....


इधर AC का तापमान बढ घट रहा है
शरीर के आराम के हिसाब से सेट हो रहा है
उधर मूला झोंपड़ी में औंघा  बीजने को घुमा रहा है 
बीजने से कभी हवा का झोंका आ रहा है
तो कभी औंघे औंघे हाथ सो रहा है
बच्चा हैजे में पड़ा है
और बेटी मलेरिया से तप रही है
फिर भी नींद मुझसे अच्छी सोता है
अपनी उस अनोखी तपती  दुनिया में कभी कभी ही रोता है


मेरी आवाज

Tuesday, May 25, 2010

गर्मी की तपन

गर्मी से ऐसे हुए हम सभी बेहाल
पसीने को पौंछ पौंछ गीला हुआ रुमाल
कूलर की भौं भौं से सर हुआ हलाल
नौता खाने जा नहीं पाते अब तो चुन्नीलाल
पानी की किल्लत से हर कोई हुआ हलाल
नहाने से बच्चों को अब कुछ नहीं मलाल
ठंडक को तरसें अब तो हर पक्षी डाल डाल

मेरी आवाज