Tuesday, May 25, 2010

गर्मी की तपन

गर्मी से ऐसे हुए हम सभी बेहाल
पसीने को पौंछ पौंछ गीला हुआ रुमाल
कूलर की भौं भौं से सर हुआ हलाल
नौता खाने जा नहीं पाते अब तो चुन्नीलाल
पानी की किल्लत से हर कोई हुआ हलाल
नहाने से बच्चों को अब कुछ नहीं मलाल
ठंडक को तरसें अब तो हर पक्षी डाल डाल

मेरी आवाज

2 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

पानी की किल्लत से हर कोई हुआ हलाल नहाने से बच्चों को अब कुछ नहीं मलाल ठंडक को तरसें अब तो हर पक्षी डाल डाल

वाह भई ...बहुत अच्छा लिखा है ...आपकी कविता मुझे तो लाजवाब लगी ...गर्मी का तो पूछो मत ..कल तो आधी रात तक नींद नहीं आई ...फिर छत पर जाकर सोना पड़ा ......सुन्दर रचना का सृजन करने के लिए आभार और बधाई

राजेन्द्र मीणा said...

आपकी पिछली कुछ रचनाएँ पढ़ी ..गज़ब का लिखते हो ///अनुसरण नहीं कर पा रहा ,,,,लगता है कोई तकनिकी दिक्कत है