Tuesday, June 1, 2010

विचार झलकियाँ

आसमान के ये बादल
सपने जैसे सुनहरे
लगते जैसे आँखों में काजल

देखा जब खुद को आईने में
सोचा में क्या हूँ
क्यूं नहीं दिखता जो हूँ मैं  

आसमान छूती गगनचुम्बी इमारतें
ना जाने क्यूं
लिखती नहीं दिखती कोई इबारतें

विशाल झील पर बैठा मैं  सोचूं
लगता है ऐसा
भर दूँ सागर अगर में आंसू न पौछूं  


1 comment:

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।