Friday, June 25, 2010

चींटी

चींटी तू इतनी सी छोटी पर बड़ी है खोटी
तुझसे छुटकारे की दिखती नहीं कोई गोटी
दिखने में तो तू है नहीं बिलकुल भी मोटी
फिर इतना खाना किधर तू करती है कल्टी
क्रमबद्ध चींटी  सेना एकजुट होकर डटी
गिरकर बार बार चढती दीवाल ये चींटी 
हार कैसे सकती है ये छोटी सी चींटी

10 comments:

ajit gupta said...

यह छोटी सी चींटी परिवार बनाकर रहती है इसीलिए इतना खाना सहेजती है। अच्‍छी कविता।

Udan Tashtari said...

सही कविता...

बेचैन आत्मा said...

दुर्दिन का भी तो करती है, चींटी इंतजाम
कल वर्षा होनी ही है, आज भले हो घाम

बेचैन आत्मा said...

दुर्दिन का भी तो करती है, चींटी इंतजाम
कल वर्षा होनी ही है, आज भले हो घाम

'अदा' said...

वैसे चीटियों का जीवन बहुत अनुशासित होता है....मनुष्य चाहे तो बहुत कुछ सीख सकता है ...
सही मायने में समय का सदुपयोग, श्रम विभाजन जैसी बातें उनकी सामजिक व्यवस्था में देखने को मिलती है...बहुत ही सुन्दर कविता...अच्छी बात किसी से भी सीख लेनी चाहिए...फिर वो चीटीं ही क्यों न हो...
आपने मेरे ब्लॉग पर आकर न सिर्फ मेरा मान बढाया मेरा हौसला भी बढाया...
हृदय से आभारी हूँ...

Akshita (Pakhi) said...

सुन्दर कविता...सार्थक सन्देश.


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'पाखी की दुनिया' में इस बार 'कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी' !

लता 'हया' said...

शुक्रिया .

सुंदर जज़्बात

abhinav pandey said...

मैं चिटठा जगत की दुनिया में नया हूँ. मेरे द्वारा भी एक छोटा सा प्रयास किया गया है. मेरी रचनाओ पर भी आप की समालोचनात्मक टिप्पणिया चाहूँगा. एवं यह भी जानना चाहूँगा की किस प्रकार मैं भी अपने चिट्ठे को लोगो तक पंहुचा सकता हूँ. आपकी सभी की मदद एवं टिप्पणिओं की आशा में आपका अभिनव पाण्डेय
यह रहा मेरा चिटठा:-
सुनहरीयादें

राकेश कौशिक said...

चींटी से बहुतों ने सिखा है और बहुत सिख सकते हैं - अच्छा सन्देश

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

जीने का मर्म सिखाती चींटी।
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किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?