Thursday, June 10, 2010

ब्लॉगर मिलन के समय की कविता


बड़ा था उत्साह हमें आपसे मिलने का
जानने का, बतियाने का
मंद मंद मुस्काने का

धुंध धुंआधार से निकली
उडती तश्तरी में उड़ने का
रूबरू होने का एजेक्स घूमने का

और क्या लिखूं
हिंदी के लिक्खाड़ के सामने
चला आया गुर भी सीखने ब्लॉग का


पूरा लेख और ब्लॉगर मिलन की रिपोर्ट इधर पढें मेरी आवाज पर

5 comments:

संजय भास्कर said...

वाह....बहुत सुन्दर.

संजय भास्कर said...

धुंध धुंआधार से निकली उडती तश्तरी में उड़ने का रूबरू होने का

बहुत खूब, लाजबाब !

संजय भास्कर said...

tyagi ki ab tak kaha chupa rakhi thi ye kavita..
behtreen rachna......

संजय भास्कर said...

tyagi ki ab tak kaha chupa rakhi thi ye kavita..
behtreen rachna......

Suman said...

nice